अनुकरण करने योग्य है स्वामी विवेकानंद जी का जीवन

5:07 PM Sahil Goyal 0 Comments


'मेरे अमरीकी बहनो और भाइयो' सम्बोधन में वह कैसा आकर्षण था, जिसने पूरी दुनिया को एक युवा सन्यासी की और देखने के लिए बाध्य कर दिया? क्या स्वामी विवेकानंद जी द्वारा 1893 में शिकागो की धर्म संसद में दिया गया भाषण इसलिए महतवपूर्ण था, क्योकि अपने उद्बोधन में उन्होंने हिन्दू धर्म, उसकी सहिष्णुता, सार्वभौमिकता और तत्कालीन समाज में व्याप्त साम्प्रदायिकता पर अपने प्रखर विचार रखे थे ?

swami vivekananda ji

उस सम्भोदन के बाद सभागार में दर तक तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही, जबकि स्वामी विवेकानंद को बोलने के लिए कुछ ही मिंट का समय दिया गया था। दरअसल  इ कुछ भी बोलने से पहले उस पर विचार करते और उन सिधान्तो को पहले अपने जीवन में लागु करते थे।  उनके सम्पूर्ण जीवन में हमे कई ऐसे उदहारण मिलते है जो आज भी अनुकरणीय है।


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बहुत काम लोग जानते है की शिकागो में हुए धर्म सम्मलेन में वे कुछ हफ्ते पहले पहुंच गए। उत्तर-पश्चिमी अमेरिका की ठण्ड सहन करने के लिए न तो स्वामी जी के पास पर्याप्त कपडे थे, और न ही रहने-खाने के लिए पर्याप्त पैसे। उन दिनों उन्होंने शिकागो में भिक्षा मांग कर अपने लिए भोजन जुटाया और यार्ड में खड़ी माल गाड़ी में राते गुजारी। सामान्य लोगो से भिन्न होते हुए भी सामान्य लोगो की तरह जीवन व्यतीत करने वाले इस भाव ने पूरी दुनिया को उनसे जोड़ दिया। जिस धर्मात्मा को लोग स्वामी विवेकानंद कहते है, असल में उनके परिजन और रिस्तेदार उन्हें वीरेश्वर, नरेन्दरनाथ या नरेन् के नाम से सम्भोदित करते थे।

विवेकानंद जी का जन्म जनवरी 12, 1863 को कोलकाता में हुआ था।  उनके पिता विशवनाथ दत्त पश्चिम बंगाल उच्च न्यायालय के अटॉर्नी जनरल थे एवं माता भुवनेशवरी देवी ग्रहिणी। उनके दादा दुर्गा प्रशाद जी बहुत ही काम उम्र में दुनिया से विरक्त होकर सन्यासी बन गए थे।


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विवेकानंद जी बचपन में बहुत ही चंचल और तारक प्रस्तुत करने वाले खोजपरत इंसान थे। उनके घर अक्सर अलग-अलग जाती-धर्म के लोगो का आना जाना लगा रहता था, इसलिए घर के दालान में अलग-अलग मेहमानो के लिए हुक्के की अलग-अलग व्यवस्था की जाती थी। अलग-अलग हुक्को की उस रीती को लेकर विवेकानंद जी के मन में बहुत ही जिज्ञासा रहती थी।  उन्होंने इस परथकता को स्व्यं  पर इस्तेमाल किया, उन्होंने सभी हुक्को को बारी-बारोई से ग्रहण किया और ग्रहण करने के बाद अपने अंदर बदलाव को जानना चाहा, और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला की सभी मनुषय एक सामान है और सभी जातीय निरर्थक।



विवेकानंद जी ने कभी भी किसी भी तरह की मानसिक जकड़न को स्व्यं पर हावी नहीं होने दिया। उनका कहना था, 'रोटी पहले, धर्म बाद में', उनकी यही बात स्पस्ट करती है की उनके लिए धर्म की व्याख्या किसी वैज्ञानिक और तार्किक है। वे शालीन व्याहवार वाले व्यक्ति थे, और सभी मनुषयो को उनके कर्म क्षेत्र में व्याहवारिक होने की राय देते थे। विवेकानंद जी मानते थे की हमारे पीढ़ीओ से चले आ रहे सिद्धांतो की वजह से देश पिछड़ रहा है। विवेकानद जी हर इंसान में ईश्वर का वास मानते थे, उन्होंने ईश्वरीय तत्व की बड़ी ही सरल व्याख्या की है, उन्होंने मानविक कार्यो को करना ही ईश्वर की सेवा करना मन है। वो मानते थे की ईश्वर भगत होने के साथ साथ इंसानो में देश भगति का भाव भी होना चाहिए। उनके लिए व्यक्ति का स्वस्थ होना बहुत ही आवयस्क है। विवेकानंद जी आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक बल की विचारधारा को एक सामान मानते थे, एक बार एक व्यक्ति ने उनसे गीता पढ़ने का अनुरोध किया, तब स्वामी जी ने उस व्यक्ति से कहा की जाओ पहले 6 महीने जाकर फुटबॉल खेलो।



एक सन्यासी मानसिक रूप से अशांत था, वो स्वामी जी के पास गए और उनसे निवारण पूछा, तब स्वामी जी ने कहा 'दुखियो और दुर्बलों की सेवा करो', यह मन की शांति का सबसे अच्छा तरीका है , स्वामी जी स्वयं भी दिन-दुखियो की सेवा के लिए हमेशा से तत्पर रहते थे। युग-पुरुष अपने अच्छे कर्मो से ही उदहारण बनते है।

उनके आचरण से प्रभावित होकर एक विदेशी महिला ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, उस महिला ने कहा की उसे विवेकानंद जी के जैसा विद्वान, शालीन और गौरवशाली पुत्र प्राप्त करने की इच्छा है, और इसके लिए उन महिला को विवेकानंद जी से विवाह करना होगा। और विवेकानंद जी ने कहा की में अभी आपका पुत्र बन जाता हूँ, इससे आपकी इच्छा अपने आप ही पूरी हो जायगी।


स्वयं बने उदाहरण

एक बार कोलकाता में प्लेग की बीमारी फैल गई और स्वामी जी भी हिमालय यात्रा के दौरान थोड़े कमजोर पड़ गए मगर फिर भी वह अपने शरीर की परवाह ना करते हुए वह रोगियों की सेवा में लग गए धन का भाव ना हो इसलिए उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि अगर जरुरत पड़े तो बिना सोचे समझे नए बन रहे मठ की जमीन बेच दे और स्वयं छात्रों की टोली बनाकर घर-घर जाकर सफाई के कार्य में लग गए

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