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प्राचीन धरोहरों का संरक्षण एक प्रश्‍न | A Question on Protection of ancient heritage

यह स्मरण करना कठिन है कि चोरी-छिपे विदेश पहुंचाई गई भारतीय कलाकृतियां को वापस लाने की जितनी कोशिशे पिछले 2-3 सालों में हुई है उतनी उससे पहले कब हुई थी? भारत सरकार के इस काम पर बहुत ही कम चर्चा हुई है इसीलिए यह जरूरी है कि इस पर चर्चा हो और इस विचार-विमर्श के दौरान इस बात की भी चर्चा हो कि हमारी धरोहरो की ठीक तरह से हिफाजत हो पा रही है या नहीं।

Maluti Temples, India

दूसरे देशों से लौटाई गई प्रतिमांए

  • ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी अबॉट ने सन 2014 में तमिलनाडु के मंदिरों से ऑस्ट्रेलिया ले जाई गई नटराज की कांस्य प्रतिमा और पत्थर की एक अर्धनारीश्वर प्रतिमा भारत को वापस लौटाई थी। 
  • ऑस्ट्रेलिया से प्रेरित होकर कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर पन्ने सन 2015 में खुजराओ के पैरेट लेडी (तोता लिए स्त्री ) की मूर्ति भारत को वापस लौटाई। 
  • जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने अक्टूबर 2015 में जम्मू कश्मीर से दुर्गा की चुराई गई मूर्ति वापस की। 
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा जून 2016 में की गई अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के अटॉर्नी जनरल द्वारा 200 प्राचीन भारतीय कलाकृतियां उन्हें वापस लौटाई। 



शुरू से ही भारत से प्राचीन कलाकृतियां और वास्तुशिल्पो की चोरी और उनका अवैध व्यापार बड़े पैमाने पर होता रहा है, यह बात तो प्रशंसा पूर्वक है कि मोदी सरकार ने इस ओर भी ध्यान देना शुरू किया है किंतु यह कोशिशे सागर में बूंद के समान है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में प्राचीन कलाकृतियों का अवैध व्यापार सबसे अधिक भारत से होता है अकेले 1980 के दशक में लगभग 50,000 प्राचीन भारतीय कलाकृतियां दूसरे देशों में पहुंची थी यह कहा जा सकता है कि इन कलाकृतियों की देखरेख बहुत ही कठिन होती है मगर इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत ही आसान होता है।

किंतु दुख की बात यह है कि जो स्मारक अपनी जगह पर स्थिर खड़े हैं भारत सरकार द्वारा उन स्मारकों की भी ठीक से देखभाल नहीं हो पा रही है परिणाम स्वरुप अनेक राष्ट्रीय स्मारक नष्ट होने की कगार पर है। दुनिया में हुए अनेक भयंकर युद्धों के परिणामस्वरूप कई प्राचीन स्थल और प्राचीन स्मारक नष्ट हुए हैं, इस नजरिए से अगर देखे तो पश्चिम एशिया के मुल्कों का नाम सबसे पहले आता है। भारत ज्यादा संघर्ष के इलाकों में तो नहीं आता फिर भी प्राचीन तत्व यहां कोई कम नष्ट नहीं हुए हैं। दरअसल यह हालात किसी बमबारी से नहीं बल्कि सरकार की लापरवाही और इन स्मारकों के प्रति जागरुकता नहीं होने से ऐसा हुआ है।


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वर्ष 2013 में जब भारत के लेखा नियंत्रक द्वारा पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित स्मारकों और प्राचीन स्थलों का सर्वेक्षण किया गया तब उसे 92 स्मारकों के विषय में पता ही नहीं चला। खोजबीन के बाद वर्ष 2016 में गायब हुए स्मारकों की संख्या कुल 24 बताई गई वर्ष 2009 में यह आंकड़ा 35 का था। कुछ दिनों पहले संसद की सीत सत्र में गायब हुए स्मारकों की सूची सौंपी गई जिसमे बताया गया कि पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सुरक्षित संरक्षित 3686 स्मारकों में से 14 स्मारकों बढ़ते शहरीकरण की वजह से खंडर हो गए 12 जलाशय-बांधों की वजह से डूब गए और 24 का कोई अता पता नहीं चला। क्या यह संभव है कोई स्मारक रातों-रात गायब हो जाए या फिर लुप्त हो जाए और किसी को पता भी ना चले?


खंडहर होते स्मारकों के कुछ उदाहरण


  • जिस लाल किले पर खड़े होकर हर साल प्रधानमंत्री 15 अगस्त को पूरे राष्ट्र को संबोधित करते है वह लाल किला केवल स्मारक ही नहीं है बल्कि वह हमारी एकता का प्रतीक है, उस लाल किले की अनेक गुंबदों में से एक गुंबद गायब हो गया, कब हुआ? कैसे हुआ? किसी को पता ही नहीं चला। 
  • मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल में पार्किंग स्थल बनाने के लिए इंडो-अफगान तरीके से निर्मित मुख्य द्वार तथा शीश महल को नष्ट किया गया। 
  • हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक आदर्श रहीम का मकबरा हाईवे के रास्ते में आने की वजह से लोगों की आंखों में खटकने लगा। 
  • अशोक का धर्म चक्र जो हमारा राष्ट्रीय चिन्ह है, उस स्मारक का द्वार आपको कूड़े के ढेर के साथ स्वागत करता है स्मारकों की ऐसी दुर्गति के अनेको उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं


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पांडुलिपियों का संरक्षण

पिछले कुछ दिनों से पांडुलिपियों के संरक्षण का मुद्दा भी बहुत अहम हो गया है। जिन वेद, उपनिषदों, पाणिनि, चरक, दर्शन, सुश्रुत, भास्कराचार्य, कालिदास,के ज्ञानो पर हमें गर्व है वह हस्तलिखित पांडुलिपि के माध्यम से हमारे पास पहुंचा है जितना ज्ञान हमें ज्ञात है उससे कहीं अधिक, कई सो-हज़ार गुना अप्रकाशित पांडुलिपियों के रूप में है, जो देश के विभिन्न संस्थानों मठों मंदिरों और विश्वविद्यालयों में बिखरा हुआ है। यह पांडुलिपियां भोजपत्र, ताड़पत्र, धातुओं और वस्तुओं पर लिखे हुए ज्ञान के रूप में मौजूद है। माना जाता है कि 50 लाख से अधिक पांडुलिपियां देश के विभिन्न संस्थानों और निजी संग्रह में रखी गई है, लगभग 60,000 यूरोप के विभिन्न देशों में है और 1,50,000 एशिया के विभिन्न देशों में इनमें 70% संस्कृत के रूप में 25% अरबी और बाकी अरबी, फारसी, तिब्बती भाषा में लिखी गई है।

यह प्राचीन लैटिन और ग्रीक पांडुलिपियों काली के संरक्षण का ही फल था जिसने यूरोप में मध्ययुग के स्थान पर आधुनिक वैज्ञानिक युग का जन्म दिया। भारत में समस्याएं हैं इन पांडुलिपियों के संरक्षण और रख-रखाव की यदि इनका सावधानीपूर्वक रख-रखाव नहीं किया गया तो हम इस अमूल्य ज्ञान से वंचित हो जाएंगे, बहुत सा ज्ञान पहले हो चुका है हो चुका है। जिस प्रकार यूरोप ने अपने सभी पांडुलिपियों को अपनी मातृभाषा में अनुवाद कराया ठीक उसी प्रकार की परियोजना की भारत में भी आवश्यकता है।


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भाषा का महत्व

किसी भी राष्ट्र की संस्कृति का संरक्षण उसकी भाषा उसकी बोलियों से होता है यदि भाषा डूबी तो संस्कृति भी धीरे-धीरे लुप्त हो जाएगी। भारत में अनगिनत भाषाएँ बोली जाती है, मात्र पिछले 50 वर्षों में 200 से ज्यादा भाषाएं लुप्त हो चुकी है और आगे आने वाले 50 वर्षों में 150 और भाषाओं के लुप्त होने की आशंका है कुछ भाषाएं तो ऐसी है जो केवल 4-5 व्यक्तियों के द्वारा ही बोली जाती है जैसे त्रिपुरा की चैंमल भाषा। हमें जरूरत है इन मरती हुयी भाषाओ को जीवित रखने की। अगर हम अपनी प्राचीन स्मारकों और धरोहरों का संरक्षण ही नहीं कर सकते तो हमें इन पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं है, इसके लिए हमें जागरूकता दिखानी होगी और हमे एक जागरूकता आंदोलन की जरूरत है

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