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1 भारत में बसते 2 देश


हम किस रिपोर्ट पर जश्न मनाये ? आइएमएफ ( अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत के जीडीपी ( सकल घरेलु उत्पाद ) के विकास की दर 2018 में 7.4 प्रतिशत और 2019 में 7.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। इसके साथ ही दुनिया के तमाम सीईओ की राय को लेकर हुए एक सर्वे में जापान को पछाड़कर भारत दुनिया न पांचवा सबसे आकर्षक गंतवय केन्डर बन गया है। आईएमएफ की रिपोर्ट आने के बाद सेंसेक्स में रिकॉर्ड उछाल देखने को मिली। 2 Countries Residing in One India - in English

1 भारत में बसते 2 देश

अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखे। उस दिन तीन और रिपोर्ट जारी हुई:

  • डब्लूईएफ़ ( विश्व आर्थिक मंच ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है की, 74 देशो में से भारत इस समावेशी विकास में दो स्थान फिसलकर 62वे  नंबर पे आ गया है, जबकि पाकिस्तान पांच स्थान ऊपर उठकर 47वे नंबर पर आ गया है। जबकि नरेंदर मोदी ने कहा था की देश में समावेशी आर्थिक विकास हो रहा है। 
  • आईएलओ ( अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघटन ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोज़गारी की दर 3 से 3.5 प्रतिशत तक बढ़ी है और अगले तीन साल तक बढ़ती रहेगी, जबकि दुनिया में बेरोज़गारी की औसत दर 5.6 से 5.8 प्रतिशत तक घटी है और आगे भी घटती रहेगी। 
  • ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष 2017 में जो पूंजी पैदा हुई, उसमे से देश के उप्पर के 1% लोगो के पास उस कुल पूंजी का 73 प्रतिशत हिस्सा आया, अर्थात बाकि 99 प्रतिशत लोगो के पास कुल पूंजी का केवल 27 प्रतिशत हिस्सा आया। देश के 67 करोड़ गरीबो की पूंजी में मात्र एक प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2014 की रिपोर्ट के अनुसार बड़े वर्ग के 1 प्रतिशत लोगो के पास मात्र 22 प्रतिशत पूंजी आई थी। 


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उपरोक्त तस्वीरें भारत की एक दम उलटी तस्वीरें पेश कर रही है। ज़ाहिर है की बड़े वर्ग की रिपोर्ट दुनिया के सीईओ को खुश करती है और शेयर बार भी खुश होकर सेंसेक्स को आसमान पर पंहुचा देता है।
अभिजात्य वर्ग को लगता है की भारत बदल रहा है।



लेकिन ये 3 रिपोर्ट्स यह स्पष्ट करती है कि भारत मंदी के दौर से गुज़र रहा है। अब सवाल यह खड़ा होता है की अगर अमीर-गरीब के बीच की खाई और बेरोज़गारी की दर ऐसे ही बढ़ती रहेगी और जीडीपी विकास की दर समावेशी न होकर केवल ऊपरी वर्ग को ही लाभ पहुंचाएगी तो क्या भारत का गरीब सेंसेक्स में उछाल देखकर अपनी भूख मिटा लेगा ?


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वास्तव में भारत के अंदर दो देश पल रहे है। एक विरासत में पायी पैतृक संपत्ति से और शेयर बाज़ार में पैसे लगाकर बिना कुछ किये मालामाल हो रहा है, और दूसरा ( किसान और मजदूर ) दिन भर मेहनत करके भी दिन में 2 वक़्त की रोटी की व्यवस्था करना भी मुहाल हो रही है। किसान पिछले चार वर्षो में शुरू के 2 साल सूखे की मार झेलता रहा और तीसरे साल में जब जीतोड़ मेहनत करने जब उपज रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाई तो उनके दाम जमीन पर आ गए, क्योकि सरकारी संस्थानों ने स्टॉक करने की और विपरण करने की पर्याप्त व्यवस्था न होने पर भण्डारण ग्रहो ने अधिकतर फसले लेने ऐ मन कर दिया और किसानो ने फैसले सड़क पर फेंकनी शुरू कर दी थी।



नतीजन किसानों ने पिछले वर्ष बहुत की कम पैदावार की। अगर जयादा उपज हो तो कम कीमत करके व्यापारी मालामाल और उपज कम होने से रेट बढे तो मध्यम वर्ग के खरीददारों पर मार। और दोनों स्थितियों में व्यापारी खुश।


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भारत के सविंधान की उद्देशिका तो कहती है के 'हम भारत के नागरिक, समस्त लोगो को अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प होकर इस सविंधान को अंगीकृत करते है। ' फिर ऐसा क्या हो रहा है की स्थिति कुछ ख़ास नहीं बदली। एक प्रतिशत वर्ग के हाथ लगातार सम्पदा इकठी होने का जश्न मनाकर दुनिया के सीईओ कहते है की निवेश के लिए भारत दुनिया का पांचवा आकर्षक गंतव्य है।



शायद उन्हें या शेयर बाजार के खिलाड़ियों को इनसे मतलब नहीं होता की अमीर-गरीब की खाई बढ़ती जा रही है, या बाल मृत्यु दर में अपेक्षित बेहतरी नहीं हो पायी है।

कई किसान खेती छोड़ रहे है इसके लिए नहीं की उनका बेटा बड़ा होकर उस उच्च वर्ग के 1 प्रतिशत का हिस्सा बनेगा बल्कि इसलिए की शायद मजदूर बनना अन्नदाता बनने से बेहतर ज़िन्दगी दे सके, यह अलग बात है की भारत में बेरोज़गारी की दर अगले कुछ सालो तक बढ़ती रहेगी।


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इन उच्च वर्ग के 1 प्रतिशत लोगो के पास 21 लाख करोड़ रूपये की संपत्ति है जो भारत के बजट के लगभग बराबर है। वर्ष 2000 में इसने पास कुल संपत्ति का 37 प्रतिशत हिस्सा था, 2005 में यह बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया था और 2010 में 48 प्रतिशत और 2012 में बढ़कर 52 प्रतिशत और 2017 में यह बढ़कर 58 प्रतिशत हो गया। 



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