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हाइफा लड़ाई का स्मृतिस्थल है तीनमूर्ति चौक


हाइफ़ा, इजराइल देश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। हाइफा की लड़ाई में शहादत देने वाले भारतीय सेना सैनिकों की याद में बने इस चौक का नाम तीन मूर्ति हाइफा चौक रख दिया गया। हाइफा युद्ध पर पेश है एक नज़र:
Indian Soldiers after victory on Haifa

  • 22-23 सितम्बर, 1918: हाइफा युद्ध की तारीख। 
  • हाइफा को आजादी दिलाने में 44 भारतीय सैनिक शहीद हुए। 
  • प्रथम विश्व युद्ध में इज़राईल की जमीन पर सहादत पाने वाले भारतीय सैनिको की संख्या 900 है। 


जाबांज भारतीय जवान 

दुश्मन कैंप में भारी-भरकम हथियारों को देख कर ब्रिटिश कमांडर हाइफा के लिए युद्ध करने से कतरा रहे थे क्योंकि भारतीय जवानों के हथियार हथियार अधिक कारगर नहीं थे। लेकिन भारतीय जवानों ने पीछे हटने से मना कर दिया। मेजर दलपत सिंह शेखावत के नेतृत्व में भारतीय सेना ने यह युद्ध जीत लिया, मगर मेजर दलपत सिंह इस युद्ध में शहीद हो गए जिसके बाद उन्हें हीरो ऑफ़ हाइफा का दर्जा दिया गया।  Read Also: प्राचीन धरोहरों का संरक्षण एक प्रश्‍न


तीन मूर्ति चौक 

युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश मूर्तिकार लेनार्ड लियोनार्ड जेनिंग्स ने 1922 में लुटियन दिल्ली में तीन मूर्ति चौक बनाया। यहाँ लगी तीन मुर्तिया जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद की सेना का प्रतिक है। भारतीय सेना हर साल 23 सितम्बर को हैफा दिवस के रूप में मनाती है।


साहस की गौरवगाथा 

हाइफा युद्ध में भारतीय सैनिकों ने साहस और युद्ध कौशल का अद्भुत परिचय दिया। भारतीय सेना ने 1350 जर्मन सैनिको को बंधी बनाने के साथ 17 बंदूके और 11 मशीन गन बरामद किये। इस युद्ध में 60 भारतीय घुड़सवार सैनिक शहीद और 80 सैनिक जख्मी हुए। इनमे से 44 हाइफा में ही शहीद हुए। वहां उन सभी शहीद सैनिकों का स्मारक बनाया गया है। Read Also: मानसिक विकार को जन्म दे रहा सेल्फी का क्रेज


पाठ्यक्रम में शामिल शहादत 

2012 में हाइफा नगरपालिका ने भारतीय सैनिकों की शहादत को अमर बनाने के लिए उनकी वीरगाथा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लिया। भारतीय सेना के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए आईफा में सालाना कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।


अंतिम कैवलरी अभियान 

हाइफा युद्ध ऐसा अंतिम युद्ध था जिसमें कैवलरी (घुड़सवार सैनिक दल) के इस्तेमाल से युद्ध जीता गया, प्रथम विश्व युद्ध के समय ऐसे आधुनिक हथियार चलन में आ गए थे जो कैवलरी से अधिक सक्षम थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद कैवलरी सैन्य प्रणाली खत्म हो गयी। Read Also: अनुकरण करने योग्य है स्वामी विवेकानंद जी का जीवन


हाइफा की जंग-ए-आज़ादी 


  • 1918 में भारतीय सेना ने ब्रिटिश सेना की सहयोगी सीमा के रूप में विश्व युद्ध लड़ा। 
  • उस समय ब्रिटिश सेना पश्चिम एशिया के बड़े भाग पर शासन करने वाले ऑटोमन साम्राज्य के साथ युद्ध कर रही थी, हाइफा इसी साम्राज्य के अधीन था। 
  • ब्रिटिश सेना ने 15वी इंपीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड को ऑटोमन और जर्मन सेना से लड़ने के लिए हाइफा भेजा। इस सेना में जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद की रियासतों से भारतीय सैनिक शामिल हुए। 
  • जोधपुर और मैसूर के सैनिकों ने मैदान-ए-जंग में युद्ध लड़ा और हैदराबाद के सैनिकों ने घायलों की सेवा और संचार सेवा जारी रखने में योगदान दिया। 



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