कहानी जैसलमेर के एक गांव कुलधरा की

12:06 PM Sahil Goyal 1 Comments


हम जब भी हिंदुस्तान के इतिहास की खोज में निकलते है हमारा रास्ता अक्सर लाइब्रेरी की मोटी मोटी किताबो तक आकर ख़तम हो जाता है। पर ऐसा भी बहुत सा इतिहास है जो कभी इन किताबो तक पहुंच ही नहीं पाया। पर ये इतिहास अब भी ज़िंदा है लोकगीतों में, लोकगाथाओं में,  बुज़ुर्गो की कहावतों में, मकानों की आहटों में, सहर के बीच बहती नदी की धाराओं में, किनारो पर बसी बस्तियों की कतरो में, यहाँ आप बस इतिहास पढोगे नहीं महसूस भी करोगे।

Jaisalmer

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'मेरु' यानि की पहाड़, पहाड़ पे बने इस किले और उसके अंदर के शहर का नाम हुआ जैसलमेर। बारहवीं सदी में राजा जैसल ने इस जगह की स्थापना की थी। जैसलमेर एक ऐतिहासिक शहर है पर इसके इतिहास के बारे में काफी कुछ लिखा-पढ़ा गया है, पर ये इतिहास सिर्फ राजाओ और राजदरबार में हुई चीज़ो के बारे में है। हमेशा की तरह इसका इतिहास यहां बनी दीवारों से दूर नहीं देखता, पर समीप के एक रेगिस्तान के बीच एक लोक-परखिलित इतिहास अब भी ज़िंदा है। और आपको बुला रहा है, तो चलिए पढ़ते है और जानते है यहाँ से अठारह किलोमीटर दूर के गांव कुलधरा की अंजानी, अनोखी और अनसुलझी कहानी ...


एक गुमसुम वीरानापन और उसमे टहलती वीरान गलिया, भूले-बिसरे घर और खाबो तले बिखरती दीवारे...... सन्नाटा और फिर झूमती हुई हवा का इक झोखा, एक रूठी सी उदासी मिली है यहाँ, छुपी सी साधी है इस जगह ने, कुछ बोलना चाहती है लेकिन सेहमी सी है, डरी हुई महसूस हो रहा है आपको?
खण्डार है आज ये जगह पर एक ज़माने में एक हस्ता, खिलखिलाता, चहकता गांव बस्ता था यहाँ।

kuldhara

Prof. Ali Nadeem Rezavi - " जब वो पहली बार कुलधरा गए 1992 के अंत में, तो वह वो जगह ऐसी नहीं थी जैसी आज है, बल्कि पूरी वीरान, धूल और बालू से ढकी हुई जगह थी जिसमे से उप्पर का कुछ हिस्सा नज़र आ रहा था, कुछ उस मलबे में दबा हुआ था, और वह वीराने का वो आलम था के कोई चिड़िया या जानवर या इंसान, कोई एक जीवित चीज वह नज़र नहीं आ रही थी "

यही बास्ते-बसाते नहीं बना था वो गांव, बहुत सोच समझ कर इस गांव का नक्शा तैयार किया होगा, बड़ी सड़के, घरो के बाहर बरामदे, गाये-भेसो के तबेले इन सब की जगह निश्चित थी।

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जिस अंदाज़े से इंडस-वैली साइट्स जैसे मोहनजो दारो और हड़पा को प्लान किआ गया था तक़रीबन-तक़रीबन वो ही लेआउट इस गांव के स्ट्रक्चर में नज़र आता है। पूरा गांव एक ग्रिड पैटर्न के लेआउट किआ गया था, जिसमे नार्थ-साउथ एलाइनमेंट है, चौड़ी-चौड़ी सड़के है, जो कार्डिनल डिरेक्शंस की तरफ रन करती है


मैन सड़के इस नार्थ तो साउथ है, और इसको  कट करती हुई 90 डिग्रीज पे कई साडी लेन्स है हो जो ईस्ट तो वेस्ट इस पुरे टाउन को अलग अलग ग्रिड में डिवाइड करती है। बहुत सारी टूटी हुई इमारते है यहाँ, बहुत बड़ा गांव हुआ करता था ये , कम से कम 200 परिवार तो रहते ही होंगे बल्कि जयादा ही।

kuldhara layout

कटे हुए पथरो को बराबर से जोड़-जोड़ कर ये घर बनाये गए थे, ना सीमेंट , ना पानी। 200 साल पहले इतने बड़े-बड़े 2 मंज़िल के घर बनाने वाले लोग काफी रहीस होंगे ना। कुलधरा जो था वो पालीवाल ब्राह्मणो का गांव था जो पाली के रहने वाले थे। 11वी शताब्दी में कहा जाता है के वह से पाली के लोग माइग्रेट करके जैसलमेंर, जोधपुर और उसके आस पास के एरियाज में आकर बस गए , लेकिन यहाँ पस्ने के बाद जो इन्होने काम करना शुरू किआ उसमे बड़े अचम्भे की बात है के ये मर्चेंट, ट्रेडर्स , एडमिनिस्ट्रेटर्स और तक़रीबन हर काम जो गांव का होता था, उसमे सिर्फ यही पालीवाल थे जो इस काम को करते थे।  इस पुरे जैसलमेर में अगर सबसे आमिर कोई कम्युनिटी थी तो ये कुलधरा के ब्राह्मणो की थी।

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एक कहानी के अनुसार सारा गांव अपने गाएँ-भेस, धन-दौलत छोड़ के रातो रत वह से फरार हो गए।  क्या बीती होगी यहाँ , क्यों छोड़ गए ये लोग कुलधरा को , पर लोग कहते है 83 और गांव है यहाँ ऐसे ही  वीराने, सुनसान, खामोश ।


ब्राह्मणों के गांव छोड़ने के पीछे बहुत सी कथाये है, एक कथा जो सबसे मशहूर है उसके अनुसार - "तक़रीबन 300 साल पहले जब गज़ सिंह नाम के मेहरवाल की जैसलमेर पे राज़ था, काफी कमज़ोर शाशक थे, और उनके शाशन में उसका जो दीवान था 'सालिम सिंह' वो जयतर पावर्स अपने हाथ में रखता था, और पुरे राज्य पे अपनी हुकूमत चलाता था, वो काफी क्रूर तबियत का था और उसने काफी जुल्म किये जैसलमेर के लोगो पे।  जैसलमेर पे मेहरवाल के हुकुम नहीं चला करते थे, बल्कि सालिम सिंह के हुकुम चलते थे। कहानियो के अनुसार सालिम सिंह की नज़र पालीवाल परिवार की एक 12 साल की लड़की के ऊपर थी, जिसका नाम था 'शक्ति मैया', सालिम सिंह उस लड़की से शादी करना चाहता था।  इस बात को पालीवाल भरमान बिलकुल नहीं मन सकते थे, क्योकि सालिम सिंह ब्राह्मण नहीं था, लेकिन सालिम सिंह ने भी हठ पकड़ राखी थी के वो इसी लड़की से शादी करेगा। ब्राह्मण इस बात से बड़े परेशान हुए, लेकिन वो शालिम सिंह की पावर्स के सामने कुछ बोल भी नहीं सकते थे।
तो उन्होंने सलीम सिंह से सोचने के लिए कुछ समय माँगा, और उस समय में सभी खेड़ो के ब्राह्मण इकठा हुए और उन्होंने तय किया की वो ये गांव छोड़ कर चले जायँगे, लेकिन अपनी बेटी एक नॉन-ब्राह्मण को नहीं देंगे, और उस रात वो सभी लोग राजस्तान छोड़ कर चले गए ।"

salim singh ki haveli

दूसरी कहानी के अनुसार " सालिम सिंह बहुत ज्यादा टैक्स अपनी जनता से लेता था, और उसने इतने भयंकर डाके डालने सुरु किये, के अगर किसी स्त्री ने पाँव में चंडी की पायल पहनी है तो उसके पाँव को काट कर पायल निकल लेता था, अगर किसी ने अंगुली में अंगूठी पहनी है तो अंगुली काट कर अंगूठी निकल लेता था।  तब वह की प्रजा परेशान होकर राजा के पास गयी और उसको बताया की किस तरह उनपर अन्याय हो रहा है, लेकिन जब वह उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई तब उन्होंने सोचा की ऐसे राज्य में रहने से क्या फायदा जहा पर उनकी बहु-बेटी सुरक्षित ना हो, जहा पर उनकी संस्कृति की और उनकी मान-मर्यादा की कोई रक्षा ना हो, उनकी धन-संपत्ति की रक्षा नहीं हो और वो सभी गांव छोड़ कर चले गए। "


लेकिन जैसलमेर के महल में रहने वाले शालिम सिंह के वंशज की कुछ अलग ही कहानी है , उनके अनुसार " शालिम सिंह की मृत्यु पालीवाल ब्राह्मणो के गांव छोड़ने से पहले ही हो गयी थी "

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Prof. Ali Nadeem Rezavi जिन्होंने वहा पे रिसर्च की है उसने अनुसार " ग्राउंड वाटर टेबल की लेवल वह लगातार नीचे जा रहा था, जिनके अनुसार वह खेती बाड़ी करने में बहुत ही दिक्कते आ रही थी, और 19वी सदी तक आते आते वह ऐसा हाल हो गया के खेती-बाड़ी वह पूरी तरह ठप हो गयी, और जितना टैक्स शालिम सिंह उनसे लेता था वो चूका पानी बहुत ही मुश्किल हो गया था, और इसी वजह से वो सभी और आस पास के गांव वाले जैसलमेर का एरिया छोड़ कर चले गए। "

कुलधरा, एक गांव जिससे जुड़े कई लोग और उनके गांव, उनके जैसलमेर से जुड़े एक कहानी और उसके कई रूप, इन सबकी टेढ़ी मेढ़ी गलियों से दौड़ता इतिहास, जिनके कैसे सवाल लेकिन कुछ जवाब, पर और भी जयादा अनुमान एहि है असली इतिहास, जहा घटना होती है एक, पर उसके कारन हर एक की अपनी-अपनी अलग-अलग राय है, और इन सब में बिचारी असलियत, सायद सभी या फिर कोई भी नहीं, मेरा अनुमान आप जो मह्सूस करो वो ही आपका इतिहास है

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